Monday, 9 October 2023

प्लवन (Flotation), उत्प्लावक बल (Buoyant force), घनत्व (Density) और मित केंद्र (Meta Center)

 भौतिक विज्ञान

भौतिकी प्राकृतिक विज्ञान की वह शाखा है जिसमें द्रव्य (matter) तथा ऊर्जा ( energy) और उसकी परस्पर क्रियाओं का अध्ययन होता है। भौतिकी प्राकृतिक जगत का मूल विज्ञान है, क्योंकि विज्ञान की अन्य शाखाओं का विकास भौतिकी के ज्ञान पर बहुत हद तक निर्भर करता है ।
 
6. प्लवन

उत्प्लावक बल (Buoyant Force) : द्रव का वह गुण जिसके कारण वह वस्तुओं पर ऊपर की ओर एक बल लगाता है, उसे उत्क्षेप या उत्प्लावक बल कहते हैं । यह बल वस्तुओं द्वारा हटाये गये द्रव के गुरुत्व- केन्द्र पर कार्य करता है जिसे उत्प्लावन केन्द्र (Centre of buoyancy) कहते हैं । इसका अध्ययन सर्वप्रथम आर्कमिडीज ने किया था।

उत्प्लावक बल द्रव में डूबी पिंड के आयतन एवं द्रव के घनत्व पर निर्भर करता है। पिंड जब द्रव में पूर्णतः डूब जाता है तो उत्प्लावक बल का मान अधिकतम हो जाता है। उत्प्लावक बल का मान ठोस वस्तु की प्रकृति एवं भार पर निर्भर नहीं करता है।

  • आर्कमिडीज का सिद्धान्त : जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूरी अथवा आंशिक रूप से डुबोई जाती है, तो उसके भार में कमी का आभास होता है। भार में यह आभासी कमी वस्तु द्वारा हटाये गये द्रव के भार के बराबर होती है।

  • प्लवन का नियम
  1. संतुलित अवस्था में तैरने पर वस्तु अपने भार के बराबर द्रव विस्थापित करती है। 
  2. ठोस का गुरुत्व - केन्द्र तथा हटाए गये द्रव का गुरुत्व- केन्द्र दोनों एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में होने चाहिए।
   

  • इसका S.I. मात्रक किलोग्राम मीटर होता है.

>आपेक्षिक घनत्व एक अनुपात है,अतः इसका कोई मात्रक नहीं होता है। 
>आपेक्षिक घनत्व को हाइड्रोमीटर से मापा जाता है।
>सामान्य जल की अपेक्षा समुद्री जल का घनत्व अधिक होता है, इसलिए उसमें तैरना आसान होता है।
>जब बर्फ समुद्र के पानी में तैरती है, तो उसके आयतन का भाग पानी के ऊपर रहता है।
>किसी बर्तन में पानी भरा है और उस पर बर्फ तैर रही है; जब बर्फ पूरी तरह पिघल जायेगी तो पात्र में >पानी का तल बढ़ता नहीं है, पहले के समान ही रहता है।
>दूध की शुद्धता दुग्धमापी (lactometer) से मापी जाती है।

  • मित केन्द्र (Meta Centre): तैरती हुई वस्तु द्वारा विस्थापित द्रव के गुरुत्व - केन्द्र को उत्प्लावन- केन्द्र कहते हैं। उल्लावन - केन्द्र से जानेवाली ऊर्ध्व रेखा जिस बिन्दु पर वस्तु के गुरुत्व - केन्द्र से जाने वाली प्रारंभिक ऊर्ध्व रेखा को काटती है उसे मित केन्द्र कहते हैं।

  • तैरने वाली वस्तु के स्थायी संतुलन के लिए शर्तें
  1. मित केन्द्र गुरुत्व केन्द्र के ऊपर होना चाहिए।
  2. वस्तु का गुरुत्व-केन्द्र तथा हटाये गये द्रव का गुरुत्व-केन्द्र अर्थात् उत्प्लावन केन्द्र दोनों को एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में होना चाहिए।

Tuesday, 3 October 2023

दाब / Pressure /

 भौतिक विज्ञान

भौतिकी प्राकृतिक विज्ञान की वह शाखा है जिसमें द्रव्य (matter) तथा ऊर्जा ( energy) और उसकी परस्पर क्रियाओं का अध्ययन होता है। भौतिकी प्राकृतिक जगत का मूल विज्ञान है, क्योंकि विज्ञान की अन्य शाखाओं का विकास भौतिकी के ज्ञान पर बहुत हद तक निर्भर करता है ।
 
5. दाब

> दाब (Pressure) : किसी सतह के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब कहते हैं अर्थात्-


> दाब का S.I. मात्रक N/m2 होता है, जिसे पास्कल (Pa) भी कहते हैं । दाब एक अदिश राशि है।


> वायुमंडलीय दाब ( Atmospheric Pressure) : सामान्यतया वायुमंडलीय दाब वह दाब होता है, जो पारे के 76 सेमी० लम्बे कॉलम के द्वारा 0°C पर 45° अक्षांश पर समुद्रतल पर लगाया जाता है। यह एक वर्ग सेमी० अनुप्रस्थ काट वाले पारे के 76 सेमी० लम्बे कॉलम के भार के बराबर होता है। वायुमंडलीय दाब का SI मात्रक बार (bar ) होता है।
  • 1 बार=102 N/m2  
>वायुमंडलीय दाब 10न्यूटन / मीटर अर्थात् एक बार के बराबर होता है।
>पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर वायुमंडलीय दाब कम होता जाता है, जिसके कारण 
(i) पहाड़ों पर खाना बनाने में कठिनाई होती है, 
(ii) वायुयान में बैठे यात्री के फाउण्टेन पेन से स्याही रिस जाती है।

>वायुमंडलीय दाब को बैरोमीटर से मापा जाता है। इसकी सहायता से मौसम संबंधी पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है।
>बैरोमीटर का पाठ्यांक जब एका-एक नीचे गिरता है, तो आँधी आने की संभावना होती है। 
>बैरोमीटर का पाठ्यांक जब धीरे-धीरे नीचे गिरता है, तो वर्षा होने की संभावना होती है। 
>बैरोमीटर का पाठ्यांक जब धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है, तो दिन साफ रहने की संभावना होती है। 

> द्रव में दाब (Pressure in Liquid) : द्रव के अणुओं द्वारा बर्तन की दीवार अथवा तली के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को द्रव का दाब कहते हैं । द्रव के अन्दर किसी बिन्दु पर द्रव के कारण दाब द्रव की सतह से उस बिन्दु की गहराई (h) द्रव के घनत्व (d) तथा गुरुत्वीय त्वरण (g) के गुणनफल के बराबर होता है। अर्थात्
  • p (दाब) = h x d x g 
द्रवों में दाब के नियम

(i) स्थिर द्रव में एक ही क्षैतिज तल में स्थित सभी बिन्दुओं पर दाब समान होता है। 
(ii) स्थिर द्रव के भीतर किसी बिन्दु पर दाब प्रत्येक दिशा में बराबर होता है।
(iii) द्रव के भीतर किसी बिन्दु पर दाब स्वतंत्र तल से बिन्दु की गहराई के अनुक्रमानुपाती होता है।
(iv) किसी बिन्दु पर द्रव का दाब द्रव के घनत्व पर निर्भर करता है। घनत्व अधिक होने पर दाब भी अधिक होता है।

द्रव - दाब सम्बन्धी पास्कल का नियम

>पास्कल के नियम का प्रथम कथन : यदि गुरुत्वीय प्रभाव को नगण्य माना जाय तो संतुलन की अवस्था में द्रव के भीतर प्रत्येक बिन्दु पर दबाव समान होता है ।
पास्कल के नियम का द्वितीय कथन : किसी बर्तन में बंद द्रव के किसी भाग पर आरोपित बल, द्रव द्वारा सभी दिशाओं में समान परिमाण में संचरित कर दिया जाता है।
पास्कल के नियम पर आधारित कुछ यंत्र हैं : हाइड्रोलिक लिफ्ट, हाइड्रोलिक प्रेस, हाइड्रोलिक ब्रेक आदि।
>द्रव का दाब उस पात्र के आकार या आकृति पर निर्भर नहीं करता जिसमें द्रव रखा जाता है।

गलनांक तथा क्वथनांक पर दाब का प्रभाव (Effect of Pressure on Melting Point and Boiling Point): -
गलनांक पर प्रभाव: 
(i) गरम करने पर जिन पदार्थों का आयतन बढ़ता है, दाब बढ़ाने पर उनका गलनांक भी बढ़ जाता है; जैसे—मोम, घी आदि।
(ii) गरम करने पर जिन पदार्थों का आयतन घट जाता है, दाब बढ़ाने पर उनका गलनांक भी कम हो जाता है; जैसे बर्फ ।
क्वथनांक पर प्रभाव : सभी द्रवों का क्वथनांक दाब बढ़ाने पर बढ़ जाता है।

Monday, 2 October 2023

Gravity and Gurutvakarshan / गुरुत्वाकर्षण

 भौतिक विज्ञान

भौतिकी प्राकृतिक विज्ञान की वह शाखा है जिसमें द्रव्य (matter) तथा ऊर्जा ( energy) और उसकी परस्पर क्रियाओं का अध्ययन होता है। भौतिकी प्राकृतिक जगत का मूल विज्ञान है, क्योंकि विज्ञान की अन्य शाखाओं का विकास भौतिकी के ज्ञान पर बहुत हद तक निर्भर करता है ।
 
4. गुरुत्वाकर्षण

  • न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton's Law of Gravitaion) : किन्हीं दो पिण्डों के बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच के दूरी की वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

  • माना दो पिण्ड जिनके द्रव्यमान m, एवं m, हैं, एक दूसरे से R दूरी पर स्थित है, तो न्यूटन के नियम के अनुसार उनके बीच लगने वाला आकर्षण - बल, F=Gm1m2/r2  होता है। जहाँ G एक नियतांक है, 
  • ×Nm2/Kgहोता है।
गुरुत्व (Gravity): न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के अनुसार दो पिंडों के बीच एक आकर्षण बल कार्य करता है । यदि इनमें से एक पिंड पृथ्वी हो तो इस आकर्षण बल को गुरुत्व कहते हैं। अर्थात्, गुरुत्व वह आकर्षण बल है, जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केन्द्र की ओर खींचती है। इस बल के कारण जो त्वरण उत्पन्न होता है, उसे गुरुत्व जनित त्वरण (g) कहते हैं, जिसका मान 9.8m/S2 होता है।

गुरुत्व जनित त्वरण (g) वस्तु के रूप, आकार, द्रव्यमान आदि पर निर्भर नहीं करता है। 

 

  • g के मान में परिवर्तन
1. पृथ्वी की सतह से ऊपर या नीचे जाने पर g का मान घटता है।
2.'g' का मान महत्तम पृथ्वी के ध्रुव (pole) पर होता है।
3. ́g ́ का मान न्यूतम विषुवत् रेखा ( equator) पर होता है। 
4. पृथ्वी के घूर्णन गति बढ़ने पर '8' का मान कम हो जाता है।
5. पृथ्वी के घूर्णन गति घटने पर '8' का मान बढ़ जाता है।

नोट : यदि पृथ्वी अपनी वर्तमान कोणीय चाल से 17 गुनी अधिक चाल से घूमने लगे तो भूमध्य रेखा पर रखी वस्तु का भार शून्य हो जायेगा।

  • लिफ्ट में पिण्ड का भार (Weight of a body in lift)

Saturday, 30 September 2023

कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति / Work, Energy, ans Power

भौतिक विज्ञान

भौतिकी प्राकृतिक विज्ञान की वह शाखा है जिसमें द्रव्य (matter) तथा ऊर्जा ( energy) और उसकी परस्पर क्रियाओं का अध्ययन होता है। भौतिकी प्राकृतिक जगत का मूल विज्ञान है, क्योंकि विज्ञान की अन्य शाखाओं का विकास भौतिकी के ज्ञान पर बहुत हद तक निर्भर करता है ।
 
3. कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति.

कार्य (Work): कार्य की माप लगाये गये बल तथा बल की दिशा में वस्तु के विस्थापन के गुणनफल के बराबर होता है। कार्य एक अदिश राशि है; इसका S. I मात्रक जूल है ।

  • कार्य = बल x विस्थापन       

नोट : यदि बल F तथा विस्थापन S के मध्य 0 कोण बनता है, तो—

  • W = F x S.cosθ 

ऊर्जा (Energy): किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता को उस वस्तु की ऊर्जा कहते हैं । ऊर्जा एक अदिश राशि है, इसका SI मात्रक जूल है ।

> कार्य द्वारा प्राप्त ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है, जो दो प्रकार की होती है—

(i) गतिज ऊर्जा (ii) स्थितिज ऊर्जा |

गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy): किसी वस्तु में उसकी गति के कारण कार्य करने की जो क्षमता आ जाती है, उसे उस वस्तु की गतिज ऊर्जा कहते हैं । यदि m द्रव्यमान की वस्तु वेग से चल रही हो, तो गतिज ऊर्जा (KE) होगी- 

  • K.E. = 1/2 mv

स्थितिज ऊर्जा (Potential energy): जब किसी वस्तु में विशेष अवस्था (State) या स्थिति के कारण कार्य करने की क्षमता आ जाती है, तो उसे स्थितिज ऊर्जा कहते हैं, जैसे :- बाँध बनाकर इकट्ठा किये गये पानी की ऊर्जा, घड़ी की चाभी में संचित ऊर्जा, तनी हुई स्प्रिंग या कमानी की ऊर्जा । गुरुत्व बल के विरुद्ध संचित स्थितिज ऊर्जा का व्यंजक है-

  • P.E. = mgh जहाँ m = द्रव्यमान, 8 - गुरुत्वजनित त्वरण, h = ऊँचाई 

ऊर्जा संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Energy ) : ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट की जा सकती है। ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित की जा सकती है। जब भी ऊर्जा किसी रूप में लुप्त होती है तब ठीक उतनी ही ऊर्जा अन्य रूपों में प्रकट होती है। अतः विश्व की सम्पूर्ण ऊर्जा का परिमाण स्थिर रहता है। यह ऊर्जा संरक्षण का नियम कहलाता है ।

ऊर्जा रूपांतरित करने वाले कुछ उपकरण:- 

Sr. उपकरण ऊर्जा का रूपान्तरण
1 डायनेमो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में
2 मोमबत्ती रासायनिक ऊर्जा को प्रकाश एवं ऊष्मा ऊर्जा में
3 माइक्रोफोन ध्वनि ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में
4 लाऊडस्पीकर विद्युत् ऊर्जा को ध्वनि ऊर्जा में
5 सोलर सेल सौर ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में
6 ट्यूब लाइट विद्युत् ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में
7 विद्युत् मोटर विद्युत् ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में
8 विद्युत् बल्ब विद्युत् ऊर्जा को प्रकाश एवं ऊष्मा ऊर्जा में
9 विद्युत् सेल रासायनिक ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में
10 सितार यांत्रिक ऊर्जा को ध्वनि ऊर्जा में

संवेग एवं गतिज ऊर्जा में संबंध : - 
  •  KE = P2 / 2              जहाँ P (संवेग) = mv
अर्थात् संवेग को दुगुना करने पर गतिज ऊर्जा चार गुनी हो जायेगी ।

शक्ति (Power) : कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं। यदि किसी कर्ता द्वारा W कार्य होगी t समय में किया जाता है, तो कर्ता की शक्ति w / t होंगी, शक्ति का SI मात्रक वाट (W) है। जिसे वैज्ञानिक जेम्स वाट के सम्मान में रखा गया है।

  • 1KW = 1000W  1MW = 106 W
*  शक्ति की एक और मात्रक अश्व शक्ति है।
  • 1 अश्व शक्ति (H.P.) = 746 W

वाट सेकण्ड (Ws) :
  • 1 वाट - सेकण्ड = 1 वाट x 1 सेकण्ड = 1 जूल
  • 1 वाट घंटा (Wh) = 3600 जूल
  • 1 किलोवाट घंटा = 1000 वाट घंटा = 3-6 × 10° जूल
W, kW, MW तथा H.P. शक्ति के मात्रक है। 
Ws, Wh, kWh कार्य अथवा ऊर्जा के मात्रक है।

Friday, 29 September 2023

गति / motion / physics in motion / motion topic /

भौतिक विज्ञान

भौतिकी प्राकृतिक विज्ञान की वह शाखा है जिसमें द्रव्य (matter) तथा ऊर्जा ( energy) और उसकी परस्पर क्रियाओं का अध्ययन होता है। भौतिकी प्राकृतिक जगत का मूल विज्ञान है, क्योंकि विज्ञान की अन्य शाखाओं का विकास भौतिकी के ज्ञान पर बहुत हद तक निर्भर करता है ।


2. गति

अदिश राशि (Scalar Quantity ) : वैसी भौतिक राशि, जिनमें केवल परिमाण होता है, दिशा नहीं, उसे अदिश राशि कहा जाता है; जैसे— द्रव्यमान, चाल, आयतन, कार्य, समय, ऊर्जा आदि।
नोट : विद्युत् धारा (Current), ताप (Temperature), दाब (Pressure) ये सभी अदिश राशियाँ हैं।

सदिश राशि (Vector Quantity): वैसी भौतिक राशि, जिनमें परिमाण के साथ-साथ दिशा भी रहती है और जो योग के निश्चित नियमों के अनुसार जोड़ी जाती है उन्हें सदिश राशि कहते हैं; जैसे—वेग, विस्थापन, बल, त्वरण आदि।

दूरी (Distance) : किसी दिये गये समयान्तराल में वस्तु द्वारा तय किये गये मार्ग की लम्बाई को दूरी कहते हैं । यह एक अदिश राशि है । यह सदैव धनात्मक (+ve) होती है । विस्थापन (Displacement ) : एक निश्चित दिशा में दो बिन्दुओं के बीच की लम्बवत् ( न्यूनतम) दूरी को विस्थापन कहते हैं । यह सदिश राशि है । इसका SI मात्रक मीटर है। विस्थापन धनात्मक, ऋणात्मक और शून्य कुछ भी हो सकता है।

चाल (Speed) : किसी वस्तु द्वारा प्रति सेकेण्ड तय की गई दूरी को चाल कहते हैं ।

  • [ चाल=दूरी/समय ]  यह एक अदिश राशि है । इसका SI मात्रक मी० / से० है।

वेग (Velocity): किसी वस्तु के विस्थापन की दर को या एक निश्चित दिशा में प्रति सेकेण्ड वस्तु द्वारा तय की गई दूरी को वेग कहते हैं । यह एक संदिश राशि है । इसका S. I. मात्रक मी० / से० है ।

त्वरण (Acceleration) : किसी वस्तु के वेग में परिवर्तन की दर को 'त्वरण' कहते हैं । यह एक सदिश राशि है । इसका SI मात्रक मी०/से०2 है । यदि समय के साथ वस्तु का वेग घटता है तो त्वरण ऋणात्मक होता है, जिसे मंदन (retardation) कहते हैं । 

वृत्तीय गति (Circular Motion ) : जब कोई वस्तु किसी वृत्ताकार मार्ग पर गति करती है, तो उसकी गति को 'वृत्तीय गति' कहते हैं । यदि वह एकसमान चाल से गति करती है, तो उसकी गति को 'एकसमान वृत्तीय गति' कहते हैं ।
वृत्तीय गति एक त्वरित गति होती है, क्योंकि वेग की दिशा प्रत्येक बिन्दु पर बदल जाती है । 

कोणीय वेग (Angular Velocity): वृत्ताकार मार्ग पर गतिशील कण को वृत्त के केन्द्र से मिलाने वाली रेखा एक सेकण्ड में जितने कोण से घूम जाती है, उसे उस कण का कोणीय वेग कहते हैं । इसे प्रायः ω (ओमेगा) से प्रकट किया जाता है।
[ω=θ/t ] - यदि कण 1 सेकेण्ड में n चक्कर लगाता है तो, {ω =2π/n} 
(क्योंकि 1 चक्कर में कण 2π (360°) रेडियन से घूम जाती है) अब यदि वृत्ताकार मार्ग की त्रिज्या है और कण 1 सेकेण्ड में n चक्कर लगाता है, तो उसके द्वारा एक सेकेण्ड में चली गयी दूरी = वृत्त की परिधि x n = 2πrn यही उसकी रेखीय चाल (Linear Speed) होगी।

न्यूटन का गति - नियम (Newton's laws of motion) : भौतिकी के पिता न्यूटन ने सन् 1687 ई० में अपनी पुस्तक 'प्रिंसिपिया' में सबसे पहले गति के नियम को प्रतिपादित किया था । 

न्यूटन का प्रथम गति-नियम (Newton's first law of motion) : यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है, तो वह विराम अवस्था में रहेगी या यदि वह एकसमान चाल से सीधी रेखा में चल रही है, तो वैसी ही चलती रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल लगाकर उसकी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन न किया जाए ।
प्रथम नियम को गैलीलियो का नियम या जड़त्व का नियम भी कहते हैं ।
बाह्य बल के अभाव में किसी वस्तु की अपनी विरामावस्था या समान गति की अवस्था को बनाये रखने की प्रवृत्ति को जड़त्व कहते हैं ।
प्रथम नियम से बल की परिभाषा मिलती है ।

बल की परिभाषा : बल वह बाह्य कारक है जो किसी वस्तु की प्रारंभिक अवस्था में परिवर्तन करता है या परिवर्तन करने की चेष्टा करता है । बल एक सदिश राशि है । इसका S. I. मात्रक न्यूटन है ।
जड़त्व के कुछ उदाहरण : 
(i) ठहरी हुई मोटर या रेलगाड़ी के अचानक चल पड़ने पर उसमें बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं।
(ii) चलती हुई मोटरकार के अचानक रुकने पर उसमें बैठे यात्री आगे की ओर झुक जाते हैं । 
(iii) कम्बल को हाथ से पकड़कर डण्डे से पीटने पर धूल के कण झड़कर गिर पड़ते हैं।

संवेग (Momentum) : किसी वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल को उस वस्तु का संवेग कहते हैं । अर्थात् संवेग = वेग x द्रव्यमान
यह एक सदिश राशि है, इसका SI मात्रक किग्रा० x मी० / से० है ।

न्यूटन का द्वितीय गति - नियम (Newton's second law of motion) : किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस वस्तु पर आरोपित बल के समानुपाती होता है तथा संवेग परिवर्तन बल की दिशा में होता है । अब यदि आरोपित बल F, बल की दिशा में उत्पन्न त्वरण a एवं वस्तु का द्रव्यमान m हो, तो न्यूटन के गति के दूसरे नियम से "F=ma" अर्थात् न्यूटन के दूसरे नियम से बल का व्यंजक प्राप्त होता है।

न्यूटन का तृतीय गति - नियम : (Newton's third law of motion) : प्रत्येक क्रिया के बराबर, परन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है । उदाहरण — 
(i) बन्दूक से गोली चलाने पर, चलाने वाले को पीछे की ओर धक्का लगना। 
(ii) नाव से किनारे पर कूदने पर नाव को पीछे की ओर हट जाना। 
(iii) रॉकेट को उड़ाने में।

संवेग संरक्षण का सिद्धान्त : यदि कणों के किसी समूह या निकाय पर कोई बाह्य बल नहीं लग रहा हो, तो उस निकाय का कुल संवेग नियत रहता है । अर्थात् टक्कर के पहले और बाद का संवेग बराबर होता है। 

आवेग (Impulse ) : जब कोई बड़ा बल किसी वस्तु पर थोड़े समय के लिए कार्य करता है, तो बल तथा समय अन्तराल के गुणनफल को उस बल का आवेग कहते हैं।
आवेग = बल x समय अन्तराल - संवेग में परिवर्तन
आवेग एक सदिश राशि है, जिसका मात्रक न्यूटन सेकण्ड (Ns) है तथा इसकी दिशा वही होती है, जो बल की होती है।

अभिकेन्द्रीय बल (Centripetal Force): जब कोई वस्तु किसी वृत्ताकार मार्ग पर चलती है, तो उस पर एक बल वृत्त के केन्द्र की ओर कार्य करता है। इस बल को ही अभिकेन्द्रीय बल कहते हैं। इस बल के अभाव में वस्तु वृत्ताकार मार्ग पर नहीं चल सकती है। यदि कोई m द्रव्यमान का पिंड V चाल से त्रिज्या के वृत्तीय मार्ग पर चल रहा है, तो उस पर कार्यकारी वृत्त के केन्द्र की ओर आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल F =mv2/r  होता है ।

अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force): अजड़त्वीय फ्रेम (Non-inertial frame ) में न्यूटन के नियमों को लागू करने के लिए कुछ ऐसे बलों की कल्पना करनी होती है जिन्हें परिवेश में किसी पिण्ड से संबंधित नहीं किया जा सकता । ये बल छद्म बल या जड़त्वीय बल कहलाते हैं । अपकेन्द्रीय बल एक ऐसा ही जड़त्वीय बल या छद्म बल है । इसकी दिशा अभिकेन्द्री बल के विपरीत दिशा में होती है। कपड़ा सुखाने की मशीन, दूध से मक्खन निकालने की मशीन आदि अपकेन्द्रीय बल के सिद्धान्त पर कार्य करती है ।
नोट :- वृत्तीय पथ पर गतिमान वस्तु पर कार्य करने वाले अभिकेन्द्री बल की प्रतिक्रिया होती है, जैसे 'मौत के कुएँ' में कुएँ की दीवार मोटर साइकिल पर अन्दर की ओर क्रिया बल लगाती है, जबकि इसका प्रतिक्रिया बल मोटर साइकिल द्वारा कुएँ की दीवार पर बाहर की ओर कार्य करता है। कभी-कभी बाहर की ओर कार्य करने वाले इस प्रतिक्रिया बल को भ्रमवश अपकेन्द्रीय बल कह दिया जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है।

बल-आघूर्ण (Moment of Force): बल द्वारा एक पिण्ड को एक अक्ष के परितः घुमाने की प्रवृत्ति को बल-आघूर्ण कहते हैं । किसी अक्ष के परितः एक बल का बल-आघूर्ण उस बल के परिमाण तथा अक्ष से बल की क्रिया - रेखा के बीच की लम्बवत् दूरी के गुणनफल के बराबर होता है । [अर्थात् बल-आघूर्ण (T) = बल x आघूर्ण भुजा ] यह एक सदिश राशि है । इसका मात्रक न्यूटन मी० होता है। 

सरल मशीन (Simple Machines ) : यह बल-आघूर्ण के सिद्धान्त पर कार्य करती है । सरल मशीन एक ऐसी युक्ति है, जिसमें किसी सुविधाजनक बिन्दु पर बल लगाकर, किसी अन्य बिन्दु पर रखे हुए भार को उठाया जाता है; जैसे- उत्तोलक, घिरनी, आनत तल, स्क्रू जैक आदि। 

उत्तोलक (Lever): उत्तोलक एक सीधी या टेढ़ी दृढ़ छड़ होती है, जो किसी निश्चित बिन्दु के चारों ओर स्वतंत्रतापूर्वक घूम सकती है । उत्तोलक में तीन बिन्दु होते हैं—
1. आलंब (Fulcrum ): जिस निश्चित बिन्दु के चारों ओर उत्तोलक की छड़ स्वतंत्रतापूर्वक घूम सकती है, उसे आलंब कहते हैं। 
2. आयास (Effort ) : उत्तोलक को उपयोग में लाने के लिए उस पर जो बल लगाया जाता है, उसे आयास कहते हैं। 
3. भार (Load): उत्तोलक के द्वारा जो बोझ उठाया जाता है अथवा रुकावट हटायी जाती . है, उसे भार कहते हैं। 


उत्तोलक के प्रकार : उत्तोलक तीन प्रकार के होते हैं-

1. प्रथम श्रेणी का उत्तोलक : इस वर्ग के उत्तोलकों में आलंब F आयास E तथा भार W के बीच में स्थित होता है। इस प्रकार के उत्तोलकों में यांत्रिक लाभ 1 से अधिक, 1 के बराबर तथा 1 से कम भी हो सकता है। इसके उदाहरण हैं— कैंची, पिलाश, सिंडासी, कील उखाड़ने की मशीन, शीश झूला, साइकिल का ब्रेक, हैंड पम्प।


2. द्वितीय श्रेणी का उत्तोलक : इस वर्ग के उत्तोलक में आलंब F तथा आयास E के बीच भार W होता है । इस प्रकार के उत्तोलकों में यांत्रिक लाभ सदैव एक से अधिक होता है। इसके उदाहरण हैं—– सरौता, नींबू निचोड़ने की मशीन, एक पहिये की कूड़ा ढोने की गाड़ी आदि।



3. तृतीय श्रेणी का उत्तोलक : इस वर्ग के उत्तोलकों में आलंब F भार W के बीच में आयास E होता है । इसका यांत्रिक लाभ सदैव एक से कम होता है। उदाहरण-चिमटा, मनुष्य का हाथ।
गुरुत्व केन्द्र (Centre of Gravity): किसी वस्तु का गुरुत्व केन्द्र, वह बिन्दु है जहाँ वस्तु का समस्त भार कार्य करता है, चाहे वस्तु जिस स्थिति में रखी जाए। वस्तु का भार गुरुत्व केन्द्र से ठीक नीचे की ओर कार्य करता है । अतः गुरुत्व केन्द्र पर वस्तु के भार के बराबर ऊपरिमुखी बल लगाकर हम वस्तु को संतुलित रख सकते हैं।



संतुलन के प्रकार : संतुलन तीन प्रकार के होते हैं— स्थायी, अस्थायी तथा उदासीन।

1. स्थायी सन्तुलन (Stable Equilibrium) : यदि किसी वस्तु को उसकी संतुलन स्थिति से थोड़ा विस्थापित किया जाय और बल हटाते ही पुनः वह पूर्व स्थिति में आ जाए तो ऐसी संतुलन को स्थायी सन्तुलन कहते हैं।

2. अस्थायी संतुलन (Unstable Equilibrium): यदि किसी वस्तु को उसकी संतुलनावस्था से थोड़ा-सा विस्थापित करके छोड़ने पर वह पुनः संतुलन की अवस्था में न आए तो इसे अस्थायी संतुलन कहते हैं।

3. उदासीन संतुलन (Neutral Equilibrium): यदि वस्तु को संतुलन की स्थिति से थोड़ा- सा विस्थापित करने पर उसका गुरुत्व केन्द्र (G) उसी ऊँचाई पर बना रहता है तथा छोड़ देने पर वस्तु अपनी नई स्थिति में संतुलित हो जाती है, तो उसका संतुलन उदासीन कहलाता है।
स्थायी संतुलन की शर्तें: किसी वस्तु के स्थायी संतुलन के लिए दो शर्तों का पूरा होना आवश्यक
(i) वस्तु का गुरुत्व - केन्द्र अधिकाधिक नीचे होना चाहिए।
(ii) गुरुत्व केन्द्र से होकर जाने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा वस्तु के आधार से गुजरनी चाहिए।


Thursday, 28 September 2023

मात्रक एवं उनकी इकाई / units and their units / Detailed Topic

भौतिक विज्ञान

भौतिकी प्राकृतिक विज्ञान की वह शाखा है जिसमें द्रव्य (matter) तथा ऊर्जा ( energy) और उसकी परस्पर क्रियाओं का अध्ययन होता है। भौतिकी प्राकृतिक जगत का मूल विज्ञान है, क्योंकि विज्ञान की अन्य शाखाओं का विकास भौतिकी के ज्ञान पर बहुत हद तक निर्भर करता है।

1. मात्रक

> मात्रक (Unit) : किसी राशि के मापन के निर्देश मानक को मात्रक कहते हैं ।
मात्रक दो प्रकार के होते हैं—मूल मात्रक (fundamental unit ) एवं व्युत्पन्न मात्रक (derived unit)
S. I. पद्धति में मूल मात्रक की संख्या सात हैं, जिसे नीचे की सारणी में दिया गया है—

Sr. प्रचलित नाम S.I. के मूल मात्रक संकेत
1 लम्बाई मीटर (metre) m(मी)
2 द्रव्यमान किलोग्राम (kilogram) kg(किग्रा)
3 समय सेकण्ड (second) s(से)
4 ताप केल्विन (kelvin) K(के)
5 विद्युत् धारा ऐम्पियर (ampere) A(ऐ)
6 ज्योति - तीव्रता कैण्डेला ( candela ) cd(कैण्ड)
7 पदार्थ का परिमाण मोल (mole) mol(मोल)

  • वे सभी मात्रक, जो मूल मात्रकों की सहायता से व्यक्त किये जाते हैं, व्युत्पन्न मात्रक कहलाते हैं।
  • बहुत लम्बी दूरियों को मापने के लिए प्रकाशवर्ष का प्रयोग किया जाता है अर्थात् प्रकाशवर्ष दूरी का मात्रक है ।  
1 प्रकाशवर्ष = 9.46 x 1015 मीटर
  • दूरी मापने की सबसे बड़ी इकाई पारसेक है ।
1 पारसेक = 3.26 प्रकाशवर्ष = 3.08x1016 मीटर
  • बल की C.G.S. पद्धति में मात्रक डाइन है एवं S. I. पद्धति में मात्रक न्यूटन है ।
1 न्यूटन = 105डाइन
  • कार्य की C.G.S. पद्धति में मात्रक अर्ग है एवं S. I. पद्धति में मात्रक जूल है ।
1 जूल = 107 अर्ग

> दस की विभिन्न घातों के प्रतीक ( Symbols for various powers of 10 ) : भौतिकी में बहुत छोटी और बहुत बड़ी राशियों के मानों को दस की घात के रूप में व्यक्त किया जाता है। 
> 10 की कुछ घातों को विशेष नाम तथा संकेत दिये गये हैं जिसे नीचे दी गई सारणी में दिया गया है।


Sr.

दस की घात

पूर्व प्रत्यय (Prefix)

प्रतीक (Symbol)

1

1018

एक्सा (exa)

E

2

1015

पेटा (peta)

P

3

1012

टेरा (tera)

T

4

109

गीगा (giga)

G

5

106

मेगा (mega)

M

6

103

किलो (kilo)

K

7

102

हेक्टो (hecto)

h

8

101

डेका (deca)

da

9

10-18

एटो (atto)

a

10

10-15

फेम्टो (femto)

f

11

10-12

पीको (pico)

p

12

10-9

नैनो (nano)

n

13

10-6

माइक्रो (micro)

μ

14

10-3

मिली (milli)

m

15

10-2

सेण्टी (centi)

c

16

10-1

डेसी (deci)

d

Important  Questions :-